Yusuf Hamied यूसुफ़ हमीद ने एड्स के खिलाफ सस्ती दवाएं विकसित कर वैश्विक स्वास्थ्य इतिहास में क्रांति ला दी। सिप्ला के अध्यक्ष के रूप में, उनके नेतृत्व में सस्ती और प्रभावी एंटीरेट्रोवायरल दवाएं करोड़ों लोगों की जान बचाई। उनका प्रयास मानवता के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है।
Yusuf Hamied AIDS के खिलाफ सस्ती दवाओं के लिए क्रांतिकारी
डॉ. यूसुफ़ हमीद ने भारतीय फार्मास्यूटिकल कंपनी सिप्ला के नेतृत्व में एड्स के इलाज के लिए सस्ती और किफायती दवाएं उपलब्ध कराकर दुनिया में क्रांति ला दी। 1990 के दशक में जब एचआईवी/AIDS महामारी तेजी से बढ़ रही थी, तब उन्होंने महंगी दवाओं का जनरल (जेनरिक) वर्जन बनाकर गरीब और विकासशील देशों के मरीजों के लिए यह इलाज सुलभ कराया।
प्रारंभिक जीवन और सिप्ला के साथ जुड़ाव

यूसुफ़ हमीद का जन्म 25 जुलाई 1936 को हुआ था। वे सिप्ला कंपनी के अध्यक्ष हैं, जिसे उनके पिता ने 1935 में स्थापित किया था। 1966 में यूसुफ़ ने सिप्ला ज्वाइन की और धीरे-धीरे कंपनी को फार्मा इंडस्ट्री में अग्रणी बनाया।
सिप्ला की स्थापना और शुरुआती संघर्ष
सिप्ला की शुरुआत 1930 के दशक में हुई थी, लेकिन यूसुफ़ ने 1970 के दशक में कंपनी की कमान संभाली और मल्टीनेशनल कंपनियों के खिलाफ कड़ी लड़ाई लड़ी, जिससे सस्ती दवाएं आम जनता तक पहुंच सकीं।
एड्स दवाओं के लिए क्रांतिकारी कदम
1990 के दशक में जब एड्स वैश्विक महामारी बन रही थी, तब यूसुफ़ ने सस्ती,
किफायती और प्रभावशाली एंटीरेट्रोवायरल दवाएं बनाने का निर्णय लिया।
2001 में सिप्ला ने एड्स की दवाओं को बाजार में पूरी दुनिया के लिए सस्ता किया।
मानवता के प्रति यूसुफ़ का समर्पण
उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य दवाओं से लाभ कमाना नहीं, बल्कि मानवता की सेवा करना है।
उनकी यह सोच लाखों लोगों के जीवन को बचाने में मददगार बनी।
वैश्विक प्रभाव और सामाजिक बदलावा
यूसुफ़ हमीद की सस्ती दवाओं ने अफ्रीका और अन्य
गरीब देशों में लाखों लोगों को बेहतर जीवन दिया।
कई देशों के स्वास्थ्य विभाग ने सिप्ला की
दवाओं को अपनी सूची में शामिल किया।
कानूनी लड़ाइयाँ और पेटेंट विवाद
सिप्ला और यूसुफ़ ने मल्टीनेशनल दवा कंपनियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी, जिससे भारत में जेनेरिक दवाओं का रास्ता साफ हुआ और दवाओं की कीमतें कम हुईं।
यूसुफ़ हमीद की विरासत और सम्मान
यूसुफ़ को फार्मा इंडस्ट्री का “गरीबों का मसीहा” कहा जाता है। वे न केवल व्यवसायी हैं,
बल्कि सामाजिक न्याय के प्रतीक भी हैं।
उनके योगदान को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।











